आज Church में कौन सी शिक्षा खतरनाक है? | Bishop Arun Michael Lal | Glory to God ministry
देखिये इस video में इस प्रश्न का उत्तर।
Church में इन ख़तरनाक शिक्षाओं से बचें | The Shepherds
Podcast | Hindi Bible Study
#ABC #bible #christianpodcast
ये वीडियो एक बड़े संवाद का हिस्सा है।
आप पूरी बातचीत इस लिंक पर जा कर सुन सकते हैं
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DEATH AND LIFE ARE IN THE CONTROL OF THE TONGUE, AND HEWHO KNOWS HOW TO USE IT WILLENJOY THE FRUITS OF IT
जीभ के वश में जीवन और मृत्यु कैसे |Mystery of Proverbs-18:21|
How Life and Death are Under the Tounge जीभ के वश में जीवन और मृत्यु, कैसे
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जीभ के वश में जीवन और मृत्यु कैसे |Mystery of Proverbs-18:21|
How Life and Death are Under the Tounge जीभ के वश में जीवन और मृत्यु, कैसे
(1)
पर चाहते हैं कि नीचे लिखे बाइबिल के पदों को संदर्भ समझते हुए पढ़िए।
हमारा विश्वास यह नहीं कि परमेश्वर चमत्कार नहीं करते हैं या छुटकारे नहीं होने चाहिए। प्रभु यीशु के नाम से बहुत अचंभे के काम होते आये हैं और आगे भी होते रहेंगे। हम यह कहते हैं कि चिन्ह और चमत्कारों का होना किसी सेवक को नापने का मुख्य मापदंड नहीं होना चाहिए।
किसी के सच्चे या झूठे होने का प्रमाण उसके चरित्र से पहचाना जाता है, ना कि उसके चमत्कारों से। "तुम उनके फलों से उन्हें पहचान लोगे" (मत्ती 7:15-23) जिनकी बात यहाँ यीशु मसीह कर रहे हैं वो लोग चमत्कार तो करते थे पर जीवन में कुकर्म भी था।
• हमारा मुख्य विरोध इस बात पर है कि चंगाई या दुष्ट आत्माओं से छुटकारे को सभा का मुख्य भाग नहीं बनाया जाना चाहिए और ना ही उसकी मार्केटिंग करनी चाहिए। आराधना सभा में बहुत देर तक यही दिखाया और सुनाया जाना कि दुष्ट आत्माएं क्या बोल रही हैं, क्या सही है???
जबकि यीशु मसीह ने उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी थी (Luk 4:41 और दुष्टात्मा चिल्लाती और यह कहती हुई, “तू परमेश्वर का पुत्र है,” बहुतों में से निकल गई पर वह उन्हें डाँटता और बोलने नहीं देता था। पौलुस ने भी यही किया (प्रेरितों के काम 16:16-17)
• प्रेरितों के काम 16:18 में लिखा है कि पौलुस दुष्ट आत्मा से ग्रसित भावी कहनेवाली महिला से बहुत परेशान हो गया था, जबकि वह महिला सुसमाचार को उद्धार का मार्ग बताते हुए, पौलुस को परमेश्वर का दास बता रही थी।
हमें अपने बारे में या प्रभु की सामर्थ के बारे में दुष्टात्मा की गवाही नहीं चाहिए।
सभाओं का केंद्र प्रभु यीशु और उसका सुसमाचार प्रचार होना चाहिए, न कि दुष्ट आत्माओं के शब्द।
अब सामर्थ की बात करते हैं।
• हम सेवाओं में आराधनाओं में अक्सर इस सामर्थ को देखते हैं, इसे और अधिक चाहते और मांगते हैं जो अच्छा है। लेकिन यहुन्ना भी एलियाह की आत्मा और सामर्थ से भरा हुआ आया था (लूका 1:17) जबकि उसने कोई चमत्कार नहीं किया। (यूहन्ना 10:41)
क्या यहुन्ना सामर्थी नहीं था? क्या वह एलियाह की सामर्थ में नहीं आया था? फिर वह बिना चमत्कार किए सामर्थ से भरा क्यों कहलाया?
बाइबिल बहुत से कामों को परमेश्वर की सामर्थ से हुए काम कहती है। किसी का पश्चाताप, किसी का उद्धार पाना, किसी का प्रेम,आनंद,मेल,धीरज,कृपा , भलाई, विश्वास , नम्रता और संयम से भर जाना पवित्र आत्मा की सामर्थ नहीं तो और क्या है।
जब पतरस ने प्रभु से पूछा कि “फिर किसका उद्धार हो सकता है?”
Mat 19:26 यीशु ने उनकी ओर देखकर कहा, “मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।”
अगर छोटी से छोटी मंडली में भी किसी का उद्धार हुआ है तो वहाँ परमेश्वर की सामर्थ काम कर रही है।
• सुसमाचार प्रचार भी सामर्थ्य से भरा हुआ कार्य है, बल्कि सुसमाचार ही परमेश्वर की सामर्थ है (रोमियों 1:16-17)। इन्हीं पदों को सिर्फ़ पढ़कर और मनन करके मार्टिन लूथर ने उस विश्वास को दोबारा स्थापित किया, जिसे लोग कई सौ सालों से भूल चुके थे।आज संपूर्ण विश्व की लाखों प्रोटेस्टेंट कलिसियाएँ उसके इस काम से प्रभावित हैं। सिर्फ़ वचन पढ़ते पढ़ते प्रकाशन से ऐसा हुआ।
योना भविष्यवक्ता इसका एक और उदाहरण है।कैसे उसने परमेश्वर के कहे न्याय भरे शब्दों का प्रचार किया और पूरा नीनवह नगर बच गया।प्रचार भी सामर्थ का काम है।
• बिली ग्राहम, जॉर्ज वाइटफील्ड, जॉन वेस्ले, चार्ल्स स्पर्जन, और उनके जैसे सैकड़ों प्रभु के दासों ने केवल सुसमाचार प्रचार के द्वारा लाखों लोगों को प्रभु में जोड़ा था। कलीसिया का इतिहास उठाकर देखें।
• दुख सहने में सामर्थ चाहिए। लूका 22:43 में प्रभु यीशु को भी दुख के प्याले को पीने के लिए सामर्थ की आवश्यकता थी। क्या स्वर्दूत उसे गत्समनी के बाग में चमत्कार करने की सामर्थ दे रहे थे, या दुख सहने हुए भी वचन को पूरा करने की?