रावण रणभूमि में उतरता है। रावण की तैयारियों को देखने उपरान्त विभीषण का मन तमाम आशंकाओं से घिरता है। वह राम से कहते हैं कि रावण कवच धारण कर रथ पर आरूढ़ है जबकि राम कवच विहीन, रथ विहीन और नंगे पाँव हैं। वे किस भाँति पराक्रमी रावण का सामना कर पायेंगे। तब मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहते हैं कि मनुष्य को जीत के लिये लोहे और लकड़ी से बना रथ नहीं चाहिये। जीत के लिये आवश्यक रथ के पहिये शौर्य और धैर्य के बने होते हैं, सत्य और शील जिसकी दृढ़ पताका और ध्वजा है। बल, विवेक, दम और परोपकार ये चार घोड़े हैं जो क्षमा, दया और क्षमतारूपी डोरी से रथ में जोड़े गये हैं। ईश्वर भजन उस रथ का सारथी है और गुरुजनों का पूजन अभेद्य कवच है। ऐसा धर्ममय रथ जिसके पास हो, वह अजेय शत्रु को भी जीत सकता है। रावण का रथ वानर सेना को क्षति पहुँचाते हुए आगे बढ़ता है। हनुमान और अंगद भी उसे बहुत देर रोक नहीं पाते। लक्ष्मण बड़े भाई राम से आज्ञा लेकर रावण के सामने आते हैं। रावण लक्ष्मण के कई प्रहारों को विफल करता है। तब राम स्वयं रण में आते हैं। राम रावण से कहते हैं कि वह अपनी वीरता काफी बखानता रहा है, अब वह इसे करके भी दिखाये। राम रावण मोह और मृत्यु का भय त्याग कर युद्ध आरम्भ करते हैं। एक ओर धर्मपथगामी राम हैं तो दूसरी तरफ कामी फलकामी रावण है। सत्य और असत्य के बीच महासंग्राम में निर्णय की घड़ी आन पड़ती है। तभी रावण की दृष्टि विभीषण पर पड़ती है। वह उसे कुलद्रोही कहकर उसपर प्रचण्ड शक्ति आघात करता है। राम विभीषण को पीछे ढकेल कर शक्ति आघात को अपने वक्ष पर झेल जाते हैं। यह देखकर विभीषण, हनुमान, सुग्रीव और जामवन्त मिलकर रावण पर प्रहार करते हैं और उसे मूर्च्छित कर देते हैं। चतुर सारथी अपने महाराज पर संकट आया जान, रथ रणभूमि से बाहर ले जाता है। चेतना लौटने पर रावण सारथी पर क्रोधित होता है और वापस रणभूमि में ले चलने का आदेश देता है। विभीषण भी राम से शिविर में चलकर घावों का उपचार कराने को कहते हैं किन्तु राम छोटे मोटे घावों को क्षत्रिय की शोभा बताते हैं। राम रावण के बीच पुनः युद्ध आरम्भ होता है। दोनों तरफ से दिव्यास्त्रों का प्रयोग होता है। राम अपने चारों ओर एक अभिमंत्रित सुरक्षा कवच बनाते हैं और फिर रावण को अपने बाणों से ऐसा परेशान करते हैं मानो वे उसके साथ युद्ध नहीं कर रहे वरन् कोई खेल खेल रहे हों। सूर्य अस्त होता। अंगद युद्ध विराम का शंख बजाते हैं। रावण अगले दिन राम को काल के गाल में भेजने का दम्भ भरता है। राम रावण को अपना परलोक सुधारने की सीख देते हैं। आज का युद्ध अनिर्णीत रहता है। शिविर में लक्ष्मण राम के घावों पर औषधि का लेप लगाते हैं। लक्ष्मण को पश्चाताप होता है कि यदि वह उस दिन भाभी सीता के कटु वचनों को बर्दाश्त कर लेते और कुटिया से बाहर न जाते तो आज उनके जीवन में लंकाकाण्ड न लिखा जाता। राम उन्हें सांत्वना देते हैं कि यह सब विधि का विधान है। सम्भवतः धरती से पापियों के नाश की भूमिका रचने के लिये ही विधाता ने सीता हरण का अध्याय लिखा है। राम लक्ष्मण को अगले दिन युद्ध से पहले विश्राम करने भेजते हैं।
भारत की अमर कहानियाँ में आपको मिलती हैं ऐसी कथाएँ जो न केवल अनोखी हैं, बल्कि हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर भी हैं। ये कहानियाँ शाश्वत हैं क्योंकि ये हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं।
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रावण रणभूमि में उतरता है। रावण की तैयारियों को देखने उपरान्त विभीषण का मन तमाम आशंकाओं से घिरता है। वह राम से कहते हैं कि रावण कवच धारण कर रथ पर आरूढ़ है जबकि राम कवच विहीन, रथ विहीन और नंगे पाँव हैं। वे किस भाँति पराक्रमी रावण का सामना कर पायेंगे। तब मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहते हैं कि मनुष्य को जीत के लिये लोहे और लकड़ी से बना रथ नहीं चाहिये। जीत के लिये आवश्यक रथ के पहिये शौर्य और धैर्य के बने होते हैं, सत्य और शील जिसकी दृढ़ पताका और ध्वजा है। बल, विवेक, दम और परोपकार ये चार घोड़े हैं जो क्षमा, दया और क्षमतारूपी डोरी से रथ में जोड़े गये हैं। ईश्वर भजन उस रथ का सारथी है और गुरुजनों का पूजन अभेद्य कवच है। ऐसा धर्ममय रथ जिसके पास हो, वह अजेय शत्रु को भी जीत सकता है। रावण का रथ वानर सेना को क्षति पहुँचाते हुए आगे बढ़ता है। हनुमान और अंगद भी उसे बहुत देर रोक नहीं पाते। लक्ष्मण बड़े भाई राम से आज्ञा लेकर रावण के सामने आते हैं। रावण लक्ष्मण के कई प्रहारों को विफल करता है। तब राम स्वयं रण में आते हैं। राम रावण से कहते हैं कि वह अपनी वीरता काफी बखानता रहा है, अब वह इसे करके भी दिखाये। राम रावण मोह और मृत्यु का भय त्याग कर युद्ध आरम्भ करते हैं। एक ओर धर्मपथगामी राम हैं तो दूसरी तरफ कामी फलकामी रावण है। सत्य और असत्य के बीच महासंग्राम में निर्णय की घड़ी आन पड़ती है। तभी रावण की दृष्टि विभीषण पर पड़ती है। वह उसे कुलद्रोही कहकर उसपर प्रचण्ड शक्ति आघात करता है। राम विभीषण को पीछे ढकेल कर शक्ति आघात को अपने वक्ष पर झेल जाते हैं। यह देखकर विभीषण, हनुमान, सुग्रीव और जामवन्त मिलकर रावण पर प्रहार करते हैं और उसे मूर्च्छित कर देते हैं। चतुर सारथी अपने महाराज पर संकट आया जान, रथ रणभूमि से बाहर ले जाता है। चेतना लौटने पर रावण सारथी पर क्रोधित होता है और वापस रणभूमि में ले चलने का आदेश देता है। विभीषण भी राम से शिविर में चलकर घावों का उपचार कराने को कहते हैं किन्तु राम छोटे मोटे घावों को क्षत्रिय की शोभा बताते हैं। राम रावण के बीच पुनः युद्ध आरम्भ होता है। दोनों तरफ से दिव्यास्त्रों का प्रयोग होता है। राम अपने चारों ओर एक अभिमंत्रित सुरक्षा कवच बनाते हैं और फिर रावण को अपने बाणों से ऐसा परेशान करते हैं मानो वे उसके साथ युद्ध नहीं कर रहे वरन् कोई खेल खेल रहे हों। सूर्य अस्त होता। अंगद युद्ध विराम का शंख बजाते हैं। रावण अगले दिन राम को काल के गाल में भेजने का दम्भ भरता है। राम रावण को अपना परलोक सुधारने की सीख देते हैं। आज का युद्ध अनिर्णीत रहता है। शिविर में लक्ष्मण राम के घावों पर औषधि का लेप लगाते हैं। लक्ष्मण को पश्चाताप होता है कि यदि वह उस दिन भाभी सीता के कटु वचनों को बर्दाश्त कर लेते और कुटिया से बाहर न जाते तो आज उनके जीवन में लंकाकाण्ड न लिखा जाता। राम उन्हें सांत्वना देते हैं कि यह सब विधि का विधान है। सम्भवतः धरती से पापियों के नाश की भूमिका रचने के लिये ही विधाता ने सीता हरण का अध्याय लिखा है। राम लक्ष्मण को अगले दिन युद्ध से पहले विश्राम करने भेजते हैं।
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Jay shree Ram....
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