"भोजनगर एवं जामनगर की बीतक" श्री बीतक साहेब चर्चा, दिवस - ८ (२०२६ ) वक्ता: आचार्य अशोक जी।।

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इस  प्रसंग में हम सतगुरु धनी श्री देवचंद्र जी के जीवन से जुड़ी अत्यंत प्रेरणादायी और अलौकिक घटनाओं को समझेंगे। जब जीव के अंदर परमात्मा को पाने की सच्ची लगन होती है, तो संसार की कोई भी माया या प्रलोभन उसे उसके मार्ग से डिगा नहीं सकता।

इस वीडियो में जानिए कि कैसे श्री देवचंद्र जी महाराज ने संसार के प्रलोभनों, चमत्कारों और दिखावे से दूर रहकर निष्काम सेवा और सच्चे प्रेम का मार्ग चुना।
विवाह और निष्काम लगन: माता-पिता के दबाव में विवाह होने के बाद भी श्री देवचंद्र जी का मन माया में नहीं बंधा और ईश्वर प्राप्ति की लगन वैसी ही बनी रही।

गुप्त सेवा का महत्व: "सेवा करे न जनावही..." — श्री देवचंद्र जी द्वारा गुरुदेव के घर की गुप्त परिक्रमा और निष्काम सेवा भाव।

सेवा के ३ प्रकार के प्रतिफल:

धन/पारिश्रमिक: भौतिक लाभ की इच्छा।

मान-प्रतिष्ठा: समाज में नाम और सम्मान पाने की चाह।

राज जी (परमात्मा) का प्रेम: सर्वोपरि निष्काम सेवा, जिससे धन और प्रतिष्ठा स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं।

चमत्कार पर विवेक: जब गुरु हरिदास जी ने बिच्छू का जहर उतारने वाला चमत्कारिक मंत्र देना चाहा, तो श्री देवचंद्र जी ने उसे विनम्रता से अस्वीकार करते हुए कहा कि जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाने वाला नामाक्षर मंत्र ही सर्वश्रेष्ठ है। (साथ ही जानिए मन की शक्ति और 'Placebo Effect' का वैज्ञानिक व व्यावहारिक दृष्टिकोण)।

बांके बिहारी जी के जामे (वस्त्र) की सेवा: श्री बालमुकुंद जी का स्वप्न-दर्शन और देवचंद्र जी द्वारा बिना किसी अहम् के, अत्यंत कठिन परिश्रम (देह पछाड़ के) के साथ अपने आराध्य की सेवा करना।

सच्ची सेवा का स्वरूप: निष्काम सेवा बनाम लोक-निंदा (लीलबाई जी का प्रसंग) और मन को समझाकर प्रसन्नतापूर्वक सेवा करने का संदेश।

ध्यान में ब्रज लीला का अलौकिक दर्शन: ध्यान साधना के दौरान श्री कृष्ण और ब्रज मंडल की लीला का दिव्य अनुभव तथा ध्यान में एकाग्रता और शरीर की स्थिरता का महत्व।
आध्यात्मिक सीख :
"दिखावे की सेवा से मान या धन तो मिल सकता है, लेकिन परमात्मा का प्रेम केवल निष्काम भाव, निश्छल मन और अहंकार-शून्य सेवा से ही प्राप्त होता है।"

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श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ के मुख्य उद्देश्य -
ज्ञान, शिक्षा, उच्च आदर्श, पावन चरित्र व भारतीय संस्कृति का समाज में प्रचार करना तथा वैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित आध्यात्मिक मूल्य द्वारा मानव को महामानव बनाना और श्री प्राणनाथ जी की ब्रम्हवाणी के द्वारा समाज में फ़ैल रही अंध-परम्पराओं को समाप्त करके सबको एक अक्षरातीत की पहचान कराना।  

अति महत्वपूर्ण नोट :-
यह पंचभौतिक शरीर हमेशा रहने वाला नहीं है।
प्रियतम परब्रह्म को पाने के लिये यह सुनहरा अवसर है।
अतः बिना समय गवाएं उस अक्षरातीत पाने के लिये प्रयास करना चाहिये।

आत्मिक दृष्टि से परमधाम, युगल स्वरुप तथा अपनी परआत्म को देखना ही चितवनि (ध्यान) है। चितवनि के बिना आत्म जागृति संभव नहीं है। संसार की अब तक की प्रचलित सभी ध्यान पद्धतियाँ निराकार-बेहद से आगे नहीं जाती हैं। तारतम ज्ञान के प्रकाश में मात्र निजानन्द योग ही परमधाम ले जा सकता है।

प्रियतम अक्षरातीत की चितवनि में इतना आनन्द है कि उसके सामने संसार के सभी सुख मिलकर भी कहीं नहीं ठहरते। यही कारण है कि ध्यान का आनन्द पाने के लिये ही राजकुमार सिद्धार्थ, महावीर, भर्तृहरि आदि ने अपने राज-पाट को छोड़ दिया और वनों में ध्यानमग्न रहे।

बेहद मण्डल - इस प्राकृतिक जगत् से परे वह बेहद मण्डल है, जिसे योगमाया का ब्रह्माण्ड कहते हैं। चारों वेदों में इसे चतुष्पाद विभूति के रूप में वर्णित किया गया है। इस मण्डल में अक्षर ब्रह्म के चारों अन्तःकरण (मन, चित, बुद्धि तथा अहंकार) की लीला होती है, जिन्हें क्रमशः अव्याकृत, सबलिक, केवल और सत्स्वरूप कहते हैं।

परमधाम - बेहद मण्डल से परे वह स्वलीला अद्वैत परमधाम है, जिसके कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म की लीला होती है। यह अनादि है, अनन्त है और सच्चिदानन्दमय है। जिस प्रकार सागर अपनी लहरों से तथा चन्द्रमा अपनी किरणों लीला करता है, उसी प्रकार अक्षरातीत भी अपनी अभिन्न स्वरूपा अंगरूपा आत्माओं के साथ अद्वैत लीला करते हैं, जो अनादि है और इसमें कभी अलगाव नहीं होता है।

वेदों ने इसी परमधाम के सम्बन्ध में “त्रिपादुर्ध्व उदैत्पुरुष” अर्थात् परब्रह्म योगमाया से परे है, कहकर मौन धारण कर लिया। मुण्डकोपनिषद् ने भी 'दिव्य ब्रह्मपुर' शब्द का प्रयोग तो किया, किन्तु उसे बेहद मण्डल (केवल ब्रह्म) में मान लिया। कुरआन में मेयराज के वर्णन के द्वारा संकेत किये जाने पर भी मुस्लिम जगत अभी इसकी वास्तविकता से बहुत दूर है।

श्री प्राणनाथजी की अलौकिक तारतम वाणी में इस परमधाम की शोभा, लीला एवं आनन्द का विशद रूप में वर्णन किया गया है, जिसका सुख किसी सौभाग्यशाली को ही प्राप्त होता है।