🌸 आज की मुरली का सार – 10 अक्टूबर 2026 🌸 आवाज़ से परे जाने का अभ्यास करो | एक बाप की याद से आत्मा को पावन बनाओ | स्नेह के रिटर्न में बाप समान बनो | Hindi Spiritual Podcast | Brahma Kumaris
आज की प्रातः मुरली में बाबा बच्चों को आत्मा की वास्तविक पहचान और परमपिता परमात्मा की याद का महत्व समझाते हैं। आत्मा को अपने को देह से न्यारा समझकर एक बाप से बुद्धियोग जोड़ना है। बाप ही सर्वशक्तिमान और ज्ञान का सागर हैं, जिनकी याद से आत्मा पतित से पावन बनती है। जितना अधिक बाप को याद करेंगे, उतनी ही आत्मा में शक्ति बढ़ेगी और पुराने विकर्मों की खाद निकलती जाएगी।
बाबा समझाते हैं कि बच्चों को अब आवाज़ से परे जाने का अभ्यास करना है। मुख से बार-बार नाम लेने के बजाय मन और बुद्धि से परमात्मा की याद में रहना है। यह योग की ड्रिल है, जिसमें आत्मा अपने परमपिता से संबंध जोड़कर शान्ति और शक्ति प्राप्त करती है। माया के अनेक तूफान आएँगे, लेकिन उनसे घबराना नहीं है। याद की यात्रा में निरन्तर अभ्यास करते हुए आत्मा को सतोप्रधान बनाना है।
आज की मुरली में 84 जन्मों के चक्र और आत्मा के सतोप्रधान से तमोप्रधान बनने के रहस्य को भी समझाया गया है। आत्मा पहले पवित्र और श्रेष्ठ स्थिति में थी, लेकिन अनेक जन्मों के पार्ट में आते-आते उसके संस्कार बदलते गए। अब संगमयुग पर बाप फिर से स्मृति दिलाते हैं कि आत्मा को अपने मूल गुणों और श्रेष्ठ स्थिति में लौटना है। बाप की याद और श्रीमत पर चलने से ही यह परिवर्तन सम्भव है।
बाबा बच्चों को सिखाते हैं कि मनसा, वाचा और कर्मणा किसी को भी दुःख नहीं देना है। अपने संस्कारों को श्रेष्ठ बनाना और किसी भी प्रकार के विकर्म से बचना है। यदि कोई परिस्थिति कठिन लगे तो स्वयं को आत्मा समझकर शान्त रहना है और बाप से शक्ति लेनी है। काम विकार से दूर रहकर पवित्रता को जीवन का आधार बनाना है।
धारणा में यह विशेष ध्यान रखना है कि बाप के स्नेह में समाए रहकर अपने श्रेष्ठ भाग्य को याद करना है। इस विचित्र ड्रामा में हर आत्मा को अपना अनादि पार्ट मिला हुआ है। इसलिए दूसरों से तुलना या उनकी चिंता करने के बजाय अपने पार्ट को श्रेष्ठ बनाना है। अपने आपसे रूहानी बातें करते हुए बाप के ज्ञान और उनकी शिक्षाओं का चिंतन करना है।
आज के वरदान में बाबा बच्चों को “स्नेह के रिटर्न में समानता का अनुभव करने वाले सर्वशक्ति सम्पन्न भव” बनने की प्रेरणा देते हैं। जो बच्चे बाप के स्नेह में सदा समाए रहते हैं, वे बाप समान बनने का पुरुषार्थ करते हैं। जब यह स्मृति रहती है कि सर्वशक्तिमान बाप मेरा साथी है, तब कोई भी परिस्थिति उन्हें विचलित नहीं कर सकती।
स्लोगन है—“पुरुषार्थी जीवन में जो सदा सन्तुष्ट और खुश रहने वाले हैं वही खुशनसीब हैं।” अव्यक्त इशारे में बाबा परोपकार की भावना से सम्पन्न बनने और अपकारी पर भी उपकार करने की प्रेरणा देते हैं। स्वर्ग के विश्व महाराजा बनने वाले बच्चों को अभी से दाता के संस्कार धारण करने हैं। सदा देने वाला बनना, शुभभावना रखना और दूसरों के प्रति कल्याण की भावना से कर्म करना ही श्रेष्ठ जीवन की पहचान है।
इस पॉडकास्ट में सुनिए:
1️⃣ आवाज़ से परे जाकर मन-बुद्धि से परमात्मा को याद करने का अभ्यास 2️⃣ एक बाप की याद से आत्मा को पतित से पावन बनाने का रहस्य 3️⃣ माया के तूफानों के बीच याद की यात्रा को निरन्तर बनाए रखने की प्रेरणा 4️⃣ 84 जन्मों के चक्र और आत्मा की सतोप्रधान स्थिति का ज्ञान 5️⃣ मनसा, वाचा, कर्मणा किसी को दुःख न देने और पवित्रता धारण करने की शिक्षा 6️⃣ बाप के स्नेह में समाकर बाप समान और सर्वशक्तिसम्पन्न बनने का वरदान 7️⃣ सन्तुष्ट और खुश रहकर अपने पुरुषार्थी जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संदेश 8️⃣ परोपकार की भावना से अपकारी पर भी उपकार करने और दाता बनने की प्रेरणा
🎧 पूरी मुरली सुनें यहाँ: https://murli.bkoceans.com/#hi/2026-1...
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आज की प्रातः मुरली में बाबा बच्चों को आत्मा की वास्तविक पहचान और परमपिता परमात्मा की याद का महत्व समझाते हैं। आत्मा को अपने को देह से न्यारा समझकर एक बाप से बुद्धियोग जोड़ना है। बाप ही सर्वशक्तिमान और ज्ञान का सागर हैं, जिनकी याद से आत्मा पतित से पावन बनती है। जितना अधिक बाप को याद करेंगे, उतनी ही आत्मा में शक्ति बढ़ेगी और पुराने विकर्मों की खाद निकलती जाएगी।
बाबा समझाते हैं कि बच्चों को अब आवाज़ से परे जाने का अभ्यास करना है। मुख से बार-बार नाम लेने के बजाय मन और बुद्धि से परमात्मा की याद में रहना है। यह योग की ड्रिल है, जिसमें आत्मा अपने परमपिता से संबंध जोड़कर शान्ति और शक्ति प्राप्त करती है। माया के अनेक तूफान आएँगे, लेकिन उनसे घबराना नहीं है। याद की यात्रा में निरन्तर अभ्यास करते हुए आत्मा को सतोप्रधान बनाना है।
आज की मुरली में 84 जन्मों के चक्र और आत्मा के सतोप्रधान से तमोप्रधान बनने के रहस्य को भी समझाया गया है। आत्मा पहले पवित्र और श्रेष्ठ स्थिति में थी, लेकिन अनेक जन्मों के पार्ट में आते-आते उसके संस्कार बदलते गए। अब संगमयुग पर बाप फिर से स्मृति दिलाते हैं कि आत्मा को अपने मूल गुणों और श्रेष्ठ स्थिति में लौटना है। बाप की याद और श्रीमत पर चलने से ही यह परिवर्तन सम्भव है।
बाबा बच्चों को सिखाते हैं कि मनसा, वाचा और कर्मणा किसी को भी दुःख नहीं देना है। अपने संस्कारों को श्रेष्ठ बनाना और किसी भी प्रकार के विकर्म से बचना है। यदि कोई परिस्थिति कठिन लगे तो स्वयं को आत्मा समझकर शान्त रहना है और बाप से शक्ति लेनी है। काम विकार से दूर रहकर पवित्रता को जीवन का आधार बनाना है।
धारणा में यह विशेष ध्यान रखना है कि बाप के स्नेह में समाए रहकर अपने श्रेष्ठ भाग्य को याद करना है। इस विचित्र ड्रामा में हर आत्मा को अपना अनादि पार्ट मिला हुआ है। इसलिए दूसरों से तुलना या उनकी चिंता करने के बजाय अपने पार्ट को श्रेष्ठ बनाना है। अपने आपसे रूहानी बातें करते हुए बाप के ज्ञान और उनकी शिक्षाओं का चिंतन करना है।
आज के वरदान में बाबा बच्चों को “स्नेह के रिटर्न में समानता का अनुभव करने वाले सर्वशक्ति सम्पन्न भव” बनने की प्रेरणा देते हैं। जो बच्चे बाप के स्नेह में सदा समाए रहते हैं, वे बाप समान बनने का पुरुषार्थ करते हैं। जब यह स्मृति रहती है कि सर्वशक्तिमान बाप मेरा साथी है, तब कोई भी परिस्थिति उन्हें विचलित नहीं कर सकती।
स्लोगन है—“पुरुषार्थी जीवन में जो सदा सन्तुष्ट और खुश रहने वाले हैं वही खुशनसीब हैं।” अव्यक्त इशारे में बाबा परोपकार की भावना से सम्पन्न बनने और अपकारी पर भी उपकार करने की प्रेरणा देते हैं। स्वर्ग के विश्व महाराजा बनने वाले बच्चों को अभी से दाता के संस्कार धारण करने हैं। सदा देने वाला बनना, शुभभावना रखना और दूसरों के प्रति कल्याण की भावना से कर्म करना ही श्रेष्ठ जीवन की पहचान है।
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1️⃣ आवाज़ से परे जाकर मन-बुद्धि से परमात्मा को याद करने का अभ्यास 2️⃣ एक बाप की याद से आत्मा को पतित से पावन बनाने का रहस्य 3️⃣ माया के तूफानों के बीच याद की यात्रा को निरन्तर बनाए रखने की प्रेरणा 4️⃣ 84 जन्मों के चक्र और आत्मा की सतोप्रधान स्थिति का ज्ञान 5️⃣ मनसा, वाचा, कर्मणा किसी को दुःख न देने और पवित्रता धारण करने की शिक्षा 6️⃣ बाप के स्नेह में समाकर बाप समान और सर्वशक्तिसम्पन्न बनने का वरदान 7️⃣ सन्तुष्ट और खुश रहकर अपने पुरुषार्थी जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संदेश 8️⃣ परोपकार की भावना से अपकारी पर भी उपकार करने और दाता बनने की प्रेरणा
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