"मैं" में नित्य/ सदैव जैसा कुछ भी नहीं है। यह ऐसा है जैसे सूंघने, बोलने, सुननें, समझने और विचार करने इत्यादि है इस शरीर के गुण। "मैं" केवल एक गुण है, और कुछ भी नहीं। Being, Isness या "मैं-अत्व" तब तक होता है जब तक होश होता है। नींद और बेहोशी में कोई "मैं" नहीं रहता । जिसने भी बेहोशी को अनुभव किया है, वह इस मैं-रहित अनुभव को सही सही बता देगा जरूर
मैं कौन हूं, यह प्रश्न बेबुनियाद है और इस पर लोग लंबे - लंबे व्याख्या देने बैठ जाते हैं मैं ब्रेन पावर हूँ। और हम जिसे आत्मा कहते हैं वास्तव मे वह ब्रेन पावर ही है जो हमारे भीतर है और हमारे बाहर जो अनन्त प्रकृति है वह परमात्मा है। प्रकृति अपने नियम से चल रही है इसलिए यह नियम ही परमात्मा है। जो इस नियम के अनुकूल है, वह परमात्मा के सम्मुख है और जो इस नियम के प्रतिकूल है वह परमात्मा के विमुख है इसलिए सभी जीव को इस नियम को अपने स्वभाव में उतरना चाहिए जो उसका धर्म कहलाता है अर्थात सभी प्राणियों का स्वभाव ही धर्म है। यही सत्य है यही सनातन है।
Fake voice. I saw him in 1973 and read hundreds of his books. Heard his lectures for yrs. this know thyself who am I BS is less than 10 yrs old. This is fake voice. If u really know his voice u can tell it is fake