क्या परिस्थितियाँ खराब हैं?यीशु मसीह के वचन का सहारा लें। ✝️🛐 #antiksajawan

जीवनको ज्योती

जीवनको ज्योती

43,227 views

विषय: क्या परिस्थितियाँ खराब हैं?

यीशु मसीह के वचन का सहारा लें

जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब हमें लगता है कि सब कुछ हमारे विरुद्ध हो रहा है। समस्याएँ बढ़ जाती हैं, भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है और मन में प्रश्न उठता है—“अब क्या होगा?”

लेकिन ऐसे समय में हमारा सहारा केवल अपनी परिस्थिति नहीं, बल्कि यीशु मसीह का वचन होना चाहिए।

यीशु ने कहा:

«“संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैंने संसार को जीत लिया है।”
— यूहन्ना 16:33»

ध्यान देने की बात है कि यीशु ने यह नहीं कहा कि विश्वासियों के जीवन में कोई परेशानी नहीं आएगी। उन्होंने पहले ही कहा कि क्लेश होगा। लेकिन उसी के साथ उन्होंने हमें ढाढ़स दिया—क्योंकि अंतिम भरोसा परिस्थितियों पर नहीं, मसीह पर है।

1. परिस्थिति को देखें, लेकिन परिस्थिति से नियंत्रित न हों

विवेक का अर्थ यह नहीं कि हम समस्या को नज़रअंदाज़ करें। यदि परिस्थिति वास्तव में कठिन है, तो उसे पहचानना आवश्यक है। लेकिन हमें यह भी देखना है कि हम उस परिस्थिति के बारे में क्या सोच रहे हैं।

हम पूछ सकते हैं:

क्या मैं डर के कारण निर्णय ले रहा हूँ?
क्या मैं केवल समस्या देख रहा हूँ और परमेश्वर की प्रतिज्ञा भूल रहा हूँ?
क्या मुझे इस समय बोलने के बजाय कुछ समय शांत रहकर प्रार्थना करनी चाहिए?
क्या मेरे सामने कोई ऐसा कदम है जिसे बुद्धिमानी और विश्वास के साथ उठाना चाहिए?

नीतिवचन 14:15 कहता है:

«“भोला तो हर एक बात का विश्वास करता है, परन्तु समझदार अपनी चाल को ध्यान से देखता है।”»

इसलिए मसीही विवेक का अर्थ है—विश्वास के साथ सावधानी और प्रार्थना के साथ समझदारी।

2. यीशु के वचन को परिस्थिति से ऊपर रखें

जब शिष्य तूफान में थे, तब उन्हें लगा कि सब कुछ समाप्त होने वाला है। लेकिन यीशु नाव में उनके साथ थे।

यीशु ने समुद्र को शांत किया और पूछा:

«“तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं?”
— मरकुस 4:40»

तूफान वास्तविक था। उनका डर भी वास्तविक था। लेकिन उनकी समस्या यह थी कि उन्होंने अपनी परिस्थिति को यीशु की उपस्थिति से बड़ा मान लिया था।

आज भी हमें यही याद रखना है:

परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन यीशु का वचन नहीं बदलता।

3. हर कठिन परिस्थिति में तुरंत निष्कर्ष न निकालें

कभी-कभी कठिन परिस्थिति देखकर हम सोच लेते हैं कि परमेश्वर ने हमें छोड़ दिया है। लेकिन कठिन समय हमेशा परमेश्वर की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं होता।

रोमियों 8:28 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर अपने प्रेम करने वालों के लिए बातों को भलाई की ओर ले जाने में कार्य करता है।

इसलिए हमें यह कहने में सावधानी रखनी चाहिए कि “यह क्यों हुआ, इसका कारण मुझे निश्चित रूप से पता है।” हर परिस्थिति का कारण हमें तुरंत समझ में आए, यह आवश्यक नहीं।

विवेक हमें सिखाता है:

जहाँ उत्तर स्पष्ट नहीं है, वहाँ भी परमेश्वर पर भरोसा किया जा सकता है।

4. यीशु के पास अपनी चिंता लेकर जाएँ

यीशु ने कहा:

«“हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”
— मत्ती 11:28»

जब परिस्थितियाँ भारी लगें, तब अकेले बोझ उठाने की आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना में यीशु के पास जाएँ।

अपनी चिंता छिपाने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन चिंता को अंतिम सत्य भी न बनने दें।

निष्कर्ष

यदि परिस्थितियाँ खराब हैं, तो उन्हें नकारना विश्वास नहीं है।

वास्तविक विश्वास यह है कि कठिन परिस्थिति को स्वीकार करते हुए भी हम यीशु मसीह के वचन पर भरोसा रखें।

आज अपने आप से पूछें:

“मेरी परिस्थिति क्या कह रही है?”
और फिर उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न पूछें:

“यीशु मसीह का वचन क्या कहता है?”

परिस्थिति कह सकती है—“डर।”

यीशु कहते हैं—“ढाढ़स बाँधो।”

परिस्थिति कह सकती है—“सब समाप्त हो गया।”

यीशु कहते हैं—“मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

इसलिए परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, हमारा विवेक, हमारा निर्णय और हमारा भरोसा यीशु मसीह के वचन के आधार पर होना चाहिए।

“यीशु मसीह कल, आज और युगानुयुग एकसा है।”
— इब्रानियों 13:8
आमेन
#jesus #lord #love