लंका दहन उपरान्त रावण मंत्री परिषद की बैठक बुलाता है। मंत्रीगण सन्देह व्यक्त करते हैं कि विभीषण की हनुमान से मिलीभगत थी अन्यथा हनुमान द्वारा लगायी गयी आग से सभी के महल भस्म हो गये किन्तु विभीषण का घर बचा रहा। रावण का नाना माल्यवान रावण को सीता के प्रति अपना हठ त्यागने का परामर्श देता है किन्तु रावण नाना का तिरस्कार करता है। रावण मेघनाद से कहता है है कि लंका का जीर्णोद्धार करने के लिये भगवान विश्वकर्मा को आदेश दिया जाये। हनुमान अशोक वाटिका वापस आकर माता सीता से मिलते हैं। वह सीता से कहते हैं कि वे उन्हें ऐसी कोई निशानी दें जिससे प्रभु राम को विश्वास हो जाय कि वह सीता माता से मिलकर आये हैं। हनुमान को आशंका है कि सम्भवतः राम केवल एक आभूषण देखकर उनकी बात का भरोसा न करें। तब सीता उन्हें राम को सुनाने के लिये जयन्त का प्रसंग कहती हैं। एक बार इन्द्र के पुत्र जयन्त ने कौवे का रूप धारण कर सीता के पैर में चोंच मार दी थी। तब राम ने जयन्त पर सरकण्डे के बाण चलाया था। जयन्त तीनों लोकों में भागता फिरा लेकिन उसका बाण से पीछा नहीं छूटा। अन्ततः वो राम की शरण में ही आया। राम ने उसकी एक आँख फोड़कर उसे दण्डित किया लेकिन प्राणदान दे दिया। हनुमान सीता माता को धीरज रखने का ढाँढस बँधा कर वापस किष्किंधा को रवाना होते हैं। उधर राम चिन्तित हैं कि काफी समय बीतने के बावजूद अभी तक खोजी वानर दलों की तरफ से कोई सूचना नहीं आयी है। सुग्रीव उन्हें बताते है दक्षिण दिशा को गया दल किलकारियाँ भरता हुआ वापस आ रहा है तो कोई अच्छा समाचार लेकर ही आया होगा। जामवन्त, अंगद और हनुमान राम के समक्ष उपस्थित होते हैं। हनुमान सीता माता की दारुण दशा राम को बताते हैं। राम की आँखों में अश्रु आते हैं। हनुमान राम को सीता का सन्देश देते हैं कि यदि एक मास के भीतर वे सीता को मुक्त नहीं कराते हैं तो वे उन्हें जीवित नहीं पायेंगे। हनुमान सीता की क्षमायाचना भी लक्ष्मण तक पहुँचाते हैं। लक्ष्मण दुखी होते हैं। हनुमान सीता माता की चूड़ामणि राम को देते हैं। राम इसे देखकर भावुक होते हैं। हनुमान जयन्त प्रसंग को सुनाकर राम को विश्वास दिलाते हैं कि वे सचमुच माता सीता से मिलकर आये हैं। राम हनुमान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। हनुमान राम के चरणों पर लोट जाते हैं। राम स्नेह से रुद्रावतार हनुमान के सिर पर हाथ फेरते हैं। उधर कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव को ऐसा प्रतीत होता है मानों प्रभु उनके सिर पर हाथ फेर रहे हों। पार्वती अचरज में पड़ती हैं।
भारत की अमर कहानियाँ में आपको मिलती हैं ऐसी कथाएँ जो न केवल अनोखी हैं, बल्कि हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर भी हैं। ये कहानियाँ शाश्वत हैं क्योंकि ये हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं।
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लंका दहन उपरान्त रावण मंत्री परिषद की बैठक बुलाता है। मंत्रीगण सन्देह व्यक्त करते हैं कि विभीषण की हनुमान से मिलीभगत थी अन्यथा हनुमान द्वारा लगायी गयी आग से सभी के महल भस्म हो गये किन्तु विभीषण का घर बचा रहा। रावण का नाना माल्यवान रावण को सीता के प्रति अपना हठ त्यागने का परामर्श देता है किन्तु रावण नाना का तिरस्कार करता है। रावण मेघनाद से कहता है है कि लंका का जीर्णोद्धार करने के लिये भगवान विश्वकर्मा को आदेश दिया जाये। हनुमान अशोक वाटिका वापस आकर माता सीता से मिलते हैं। वह सीता से कहते हैं कि वे उन्हें ऐसी कोई निशानी दें जिससे प्रभु राम को विश्वास हो जाय कि वह सीता माता से मिलकर आये हैं। हनुमान को आशंका है कि सम्भवतः राम केवल एक आभूषण देखकर उनकी बात का भरोसा न करें। तब सीता उन्हें राम को सुनाने के लिये जयन्त का प्रसंग कहती हैं। एक बार इन्द्र के पुत्र जयन्त ने कौवे का रूप धारण कर सीता के पैर में चोंच मार दी थी। तब राम ने जयन्त पर सरकण्डे के बाण चलाया था। जयन्त तीनों लोकों में भागता फिरा लेकिन उसका बाण से पीछा नहीं छूटा। अन्ततः वो राम की शरण में ही आया। राम ने उसकी एक आँख फोड़कर उसे दण्डित किया लेकिन प्राणदान दे दिया। हनुमान सीता माता को धीरज रखने का ढाँढस बँधा कर वापस किष्किंधा को रवाना होते हैं। उधर राम चिन्तित हैं कि काफी समय बीतने के बावजूद अभी तक खोजी वानर दलों की तरफ से कोई सूचना नहीं आयी है। सुग्रीव उन्हें बताते है दक्षिण दिशा को गया दल किलकारियाँ भरता हुआ वापस आ रहा है तो कोई अच्छा समाचार लेकर ही आया होगा। जामवन्त, अंगद और हनुमान राम के समक्ष उपस्थित होते हैं। हनुमान सीता माता की दारुण दशा राम को बताते हैं। राम की आँखों में अश्रु आते हैं। हनुमान राम को सीता का सन्देश देते हैं कि यदि एक मास के भीतर वे सीता को मुक्त नहीं कराते हैं तो वे उन्हें जीवित नहीं पायेंगे। हनुमान सीता की क्षमायाचना भी लक्ष्मण तक पहुँचाते हैं। लक्ष्मण दुखी होते हैं। हनुमान सीता माता की चूड़ामणि राम को देते हैं। राम इसे देखकर भावुक होते हैं। हनुमान जयन्त प्रसंग को सुनाकर राम को विश्वास दिलाते हैं कि वे सचमुच माता सीता से मिलकर आये हैं। राम हनुमान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। हनुमान राम के चरणों पर लोट जाते हैं। राम स्नेह से रुद्रावतार हनुमान के सिर पर हाथ फेरते हैं। उधर कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव को ऐसा प्रतीत होता है मानों प्रभु उनके सिर पर हाथ फेर रहे हों। पार्वती अचरज में पड़ती हैं।
भारत की अमर कहानियाँ में आपको मिलती हैं ऐसी कथाएँ जो न केवल अनोखी हैं, बल्कि हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर भी हैं। ये कहानियाँ शाश्वत हैं क्योंकि ये हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं।
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