#Periyar #EVRamasamiPeriyar #SamajikNyayKiPathsala #SocialJustice #DravidKadagam #DMK #Tamil #SouthIndia
यह दुनिया एक अबूझ पहेली थी। इसे सुलझाने में इन्सानों ने बहुत कुछ किया। उनमें ख़ास हैं चरवाहे। क्योंकि कुछ चरवाहों ने दुनिया को अनगिनत नए नए रास्ते देकर दुनिया बदल दी। नए नए रास्ते, केवल चलने के लिए ही नहीं, जीने के लिए भी। सामाजिक व सांस्कृतिक क्रान्ति के रास्ते; दर्शन व विचार के रास्ते; सियासत से लेकर इबादत के नए रास्ते। मगर जब दुनिया खूबसूरत व ख़ुशहाल हुई; तो सत्ता कब्ज़ाए ज़ालिमों ने चरवाहों के इतिहास मिटाने की नाक़ाम कोशिशें कीं। आज हम ऐसे ही एक चरवाहे पर बात करने जा रहेे।
हम उत्तर भारतीय लोग अमूमन उत्तर के थोड़े से मैदानी इलाकों को ही पूरा देश समझकर जीने के आदी हो चुके हैं। हमारी सोच समझ के कोर में केवल उत्तर ही बसा है। उनमें पूर्वोत्तर, पहाड़, पठार कहाँ हैं? तनिक सोचिए कि आपने कभी दक्षिण भारत को करीब से देखा है? कितना जानते हैं दक्षिण को? सुनते हैं कि उत्तर की तुलना में बहुत ख़ुशहाल है, काफी आगे है, अलग है। इसके पीछे कौन कौन लोग थे? उनके पीछे कौन थे? इसकी क्या क्या वज़हें रही होंगी?
क्या आप जानते हैं कि इसी भारत देश एक ही कई अटूट हिस्सों में राम की नहीं, रावण की पूजा होती है? यहीं रावण के मंदिर भी हैं? (इस पर सच्ची रामायण के बहाने बात किताबों की पाठशाला के अगले एपिसोड में होनी है।)
भारत में जब देश के अगुआ नेता सफ़ेद रंग को पहनने ओढ़ने व बिछाने में इस्तेमाल कर रहे थे, एक ऐसा नेता भी हुआ है, जो काला को अपना पसंदीदा रंग मानता था। उसने आत्मसम्मान की लड़ाई छेड़कर शूद्रों, अतिशूद्रों को अपने वजूद का एहसास कराया। वह डॉ. आंबेडकर और लोहिया के साथ मिलकर एक मुकम्मल भारत बनाना चाहता था।
महिलाओं के गहनों व आभूषणों को बेड़ियाँ कहकर सभी महिलाओं के हक़ व समानता व आज़ादी के लिए लड़ा?
इन सभी मसलों के साथ आज हम बात कर रहे हैं ई. वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' पर.
#सामाजिक_न्याय_की_पाठशाला
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डॉ. लक्ष्मण यादव
दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाला एक अस्थाई (एडहॉक) असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हूँ. सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक मसलों पर सोचना, समझना, पढ़ना, लिखना, बोलना और बातें करना अच्छा लगता है. सामाजिक न्याय की वैचारिकी से बेहद प्रभावित हूँ. सामाजिक न्याय के भीतर आर्थिक और लैंगिक न्याय को मानता हूँ. न्याय, समता पर आधारित मोहब्बत की दुनिया का ख़्वाब देखता हूँ. अगर आप भी मेरे हमख़्वाब होना चाहते हैं, तो मुझसे जुड़िये.
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यह दुनिया एक अबूझ पहेली थी। इसे सुलझाने में इन्सानों ने बहुत कुछ किया। उनमें ख़ास हैं चरवाहे। क्योंकि कुछ चरवाहों ने दुनिया को अनगिनत नए नए रास्ते देकर दुनिया बदल दी। नए नए रास्ते, केवल चलने के लिए ही नहीं, जीने के लिए भी। सामाजिक व सांस्कृतिक क्रान्ति के रास्ते; दर्शन व विचार के रास्ते; सियासत से लेकर इबादत के नए रास्ते। मगर जब दुनिया खूबसूरत व ख़ुशहाल हुई; तो सत्ता कब्ज़ाए ज़ालिमों ने चरवाहों के इतिहास मिटाने की नाक़ाम कोशिशें कीं। आज हम ऐसे ही एक चरवाहे पर बात करने जा रहेे।
हम उत्तर भारतीय लोग अमूमन उत्तर के थोड़े से मैदानी इलाकों को ही पूरा देश समझकर जीने के आदी हो चुके हैं। हमारी सोच समझ के कोर में केवल उत्तर ही बसा है। उनमें पूर्वोत्तर, पहाड़, पठार कहाँ हैं? तनिक सोचिए कि आपने कभी दक्षिण भारत को करीब से देखा है? कितना जानते हैं दक्षिण को? सुनते हैं कि उत्तर की तुलना में बहुत ख़ुशहाल है, काफी आगे है, अलग है। इसके पीछे कौन कौन लोग थे? उनके पीछे कौन थे? इसकी क्या क्या वज़हें रही होंगी?
क्या आप जानते हैं कि इसी भारत देश एक ही कई अटूट हिस्सों में राम की नहीं, रावण की पूजा होती है? यहीं रावण के मंदिर भी हैं? (इस पर सच्ची रामायण के बहाने बात किताबों की पाठशाला के अगले एपिसोड में होनी है।)
भारत में जब देश के अगुआ नेता सफ़ेद रंग को पहनने ओढ़ने व बिछाने में इस्तेमाल कर रहे थे, एक ऐसा नेता भी हुआ है, जो काला को अपना पसंदीदा रंग मानता था। उसने आत्मसम्मान की लड़ाई छेड़कर शूद्रों, अतिशूद्रों को अपने वजूद का एहसास कराया। वह डॉ. आंबेडकर और लोहिया के साथ मिलकर एक मुकम्मल भारत बनाना चाहता था।
महिलाओं के गहनों व आभूषणों को बेड़ियाँ कहकर सभी महिलाओं के हक़ व समानता व आज़ादी के लिए लड़ा?
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डॉ. लक्ष्मण यादव
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