जो वृंदावन की धूल उठाए, वही ठाकुर को प्रिय हो जाए भक्ति झाड़ू नहीं, भाव है – वृंदावन की रानी सिखा गईं सेवा से संवरती है भक्ति – यहीं खुलते हैं वैकुण्ठ के द्वार वैकुण्ठ का मार्ग, वृंदावन की गलियों से होकर जाता है जहाँ श्रम में प्रेम हो – वहीं ठाकुर का निवास होता है प्रेम से बुहारो – ठाकुर मन में स्वयं विराजते हैं महतरानी की लीला – सेवा में वैकुण्ठ, भाव में ठाकुर जो प्रेम से द्वार बुहारे, ठाकुर वहीं चरण रखते हैं
भक्ति झाड़ू नहीं, भाव है – वृंदावन की रानी सिखा गईं
सेवा से संवरती है भक्ति – यहीं खुलते हैं वैकुण्ठ के द्वार
वैकुण्ठ का मार्ग, वृंदावन की गलियों से होकर जाता है
जहाँ श्रम में प्रेम हो – वहीं ठाकुर का निवास होता है
प्रेम से बुहारो – ठाकुर मन में स्वयं विराजते हैं
महतरानी की लीला – सेवा में वैकुण्ठ, भाव में ठाकुर
जो प्रेम से द्वार बुहारे, ठाकुर वहीं चरण रखते हैं